ऐतिहासिक बीबी का मकबरा मे भी उर्दू भाषा के साथ सौतेला व्यवहार उर्दू भाषा मे जानकारी फलक लगाया जाए - एस.एम.युसूफ़, एम.एम.शेख
बीड़ (एस.एम.न्युज़) - ज़िले के बाजू में औरंगाबाद अभी छत्रपति संभाजी नगर में स्थित ऐतिहासिक बीवी का मकबरा में उर्दू भाषा का जानकारी फलक लगाया जाए ऐसी मांँग देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, महानिदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, नई दिल्ली, निदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, औरंगाबाद, मराठवाड़ा विभागीय आयुक्त, औरंगाबाद के ज़िलाधिकारी, आयुक्त, महापौर और विरोधी पक्ष नेता महानगरपालिका औरंगाबाद इन्हें बीड़ ज़िलाधिकारी द्वारा आज़ाद सहाफी एस.एम.युसूफ़ और प्रसिद्ध गायक एम.एम.शेख ने भेजे हुए आवेदन पत्र में की है।
उपरोक्त विषय मे भेजे आवेदन पत्र मे कहा है कि, आज के छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) शहर महाराष्ट्र मे स्थित हमारी ऐतिहासिक धरोहर बीबी का मकबरा जो बादशाह औरंगजेब ने सदियों पहले बनाया हुआ है, इस ऐतिहासिक वास्तु को देखने के लिए आनेवाले पर्यटकों को जानकारी मिले ईसलिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा यहां तीन जानकारी फलक लगाए गए हैं। जो हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषा में दार्शनिक है। हम भारतीय मानते हैं कि, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मराठी महाराष्ट्र की भाषा है। जो पूरे महाराष्ट्र के मुकाबले मराठवाड़ा में ज्यादा इस्तेमाल होती है और अंग्रेजी पाश्चात्य भाषा है। इसलिए इन तीनों भाषाओं के फलक बीबी का मकबरा में लगवाए गए हैं। बीबी का मकबरा देखने के लिए आनेवाले पर्यटक न सिर्फ़ महाराष्ट्र और हमारे भारत देश से बल्कि पूरे विश्व से आते हैं। इसलिए बीबी का मकबरा की संक्षिप्त जानकारी देने के लिए यहांँ हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं में जानकारी के फलक लगवाए गए हैं। लेकिन उर्दू भाषा को नज़र अंदाज करके दरकिनार कर दिया गया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि, उर्दू भाषा के साथ बीबी का मकबरा में सौतेला व्यवहार किया गया है। जबकि उर्दू भाषा न सिर्फ़ महाराष्ट्र बल्कि अपने पूरे भारत देश में लिखी-पढ़ी जाती है। साथ ही पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका वगैरा के साथ ही अन्य इस्लामी देशों मे भी पढ़ी जाती है। बीबी का मकबरा देखने के लिए अपने पूरे भारत देश के साथ ही विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में हर दिन आते रहते हैं। जिन मे ऐसे भी मुस्लिम पर्यटक बड़ी संख्या में रहते हैं, जिन्होंने कभी स्कूली शिक्षा नहीं ली। इसलिए वह हिंदी, मराठी, अंग्रेजी भाषाएं ना पढ़ सकते हैं, ना लिख सकते हैं। लेकिन चुंकि वह मुसलमान है इसलिए वह क़ुरआन पढ़ते हैं। क़ुरआन ज्यादातर मुस्लिम अरबी भाषा मे पढ़ते हैं। इसलिए अरबी भाषा से मिलती-जुलती उर्दू भाषा भी क़ुरआन पढ़नेवालों को आती है। और फ़ीर वैसे भी उर्दू भाषा कोई विदेशी भाषा नहीं है बल्कि यह भाषा भारत में ही पैदा हुई, पली बढ़ी है। इसी भाषा में हमारे भारत देश में बड़े-बड़े विद्वान, शायर, लेखक, कवि हुए और आज भी है। यह सिर्फ़ मुसलमानों की भाषा नहीं है अपितु पूरे भारतवर्ष की भाषा है। इसलिए जिस तरह बीबी का मकबरा में हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषा में जानकारी के फलक लगवाए गए हैं उसीतरह उर्दू भाषा मे भी जानकारी का फलक लगाया जाए। ताकि बीबी का मकबरा देखने आए पर्यटक जिन्हें हिंदी, मराठी और अंग्रेजी भाषा ना आती हो, पर जो उर्दू भाषा पढ़ सकते हैं, समझते है, ऐसे पर्यटकों के लिए बीबी का मकबरा में उर्दू भाषा का जानकारी फलक लगवाना ज़रूरी है। इसलिए यहांँ हिंदी, मराठी और अंग्रेजी के लगवाए गए फलक के साथ ही उर्दू भाषा मे जानकारी फलक लगवाया जाए। ऐसी माँग आज़ाद सहाफी एस.एम.युसूफ़ और प्रसिद्ध गायक एम.एम.शेख ने ज़िलाधिकारी बीड़ द्वारा भेजे आवेदन पत्र में की है।
*ऐतिहासिक इमारतों की देखरेख और संरक्षण करना सरकार का कर्तव्य है!*
महाराष्ट्र और पूरे भारत में ऐतिहासिक इमारतों के सामने हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू भाषा में सूचना बोर्ड लगाने की ज़रूरत है। बीबी का मकबरा तो सिर्फ़ एक उदाहरण है। दरअसल, महाराष्ट्र और देशभर में मुगल काल के कई ऐतिहासिक स्मारक मौजूद हैं। समय-समय पर इनका रख-रखाव, संरक्षण, मरम्मत करना। उनके बारे में हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में सूचना बोर्ड लगाना ज़रूरी है। ऐसी ऐतिहासिक इमारतों की वजह से न सिर्फ़ हम अपने देश का इतिहास जानते हैं, बल्कि ऐसी ऐतिहासिक इमारतों की वजह से सरकारी खज़ाने में हर दिन बड़ी मात्रा में राजस्व भी इकट्ठा होता है।
*सरकार के लिए राजस्व का एक स्रोत!*
बीबी का मकबरा देखने के लिए आए भारतीय पर्यटकों से प्रति व्यक्ति 25 रुपये और विदेशी पर्यटकों से 300 रुपये शुल्क लिया जाता है। इसके अलावा यहांँ बादशाह औरंगजेब की पत्नी बीबी दिलरास बानो की कब्र को देखकर कई पर्यटक कब्र पर जितना हो सके उतना पैसा ड़ालते हैं। टिकट के अलावा कब्र के पास जमा होने वाली यह रक़म भी सरकार को लाखों रुपये का राजस्व दिला रही है। इसलिए ऐसी ऐतिहासिक संरचनाओं का समुचित संरक्षण न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। सरकार और प्रशासन को इस बारे में सोचना बेहद ज़रूरी है।
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*एस.एम.युसूफ़* (मुक्तपत्रकार)
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