*ख़्वाब और आग*
*ख़्वाब और आग*
अक्सर वो ख़्वाबों में आते है
आकर प्यार लुटाते है
ख़्वाबों में हकीक़त कहाँ
फ़ीर भी आ ही जाते है ख़्वाबों में यहाँ-वहाँ
ज़िदगानी में जो साथ गुज़ारे थे लम्हें उनके
परेशाँ करते है हमें ख़्वाबों में लम्हें उनके
जो ज़िंदगी मे अब कभी मिल नहीं सकते
वो ख़्वाबों मे अक्सर क्यूँ है दिखते?
या अल्लाह अब आप ही कुछ करीये
हमारे दिल, दिमाग, नज़र और ख़्वाबों से उन्हें हटाईये
वरना ख़्वाबों में भी गुनाह होते रहेंगे
मरने के बाद जन्नत मिले ना मिले
पर जीते जी जहन्नम की आग में जलते रहेंगे।
*- एस.एम.युसूफ़* (मुक्तपत्रकार)
आसेफ़ नगर, बीड़
संपर्क - *9021 02 3121*
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