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'दादा' ये शब्द सिर्फ़ अजित दादा के लिए ही बना था


 'दादा' ये शब्द सिर्फ़ अजित दादा के लिए ही बना था

वैसे तो मैं किसी राजनेता के फैन होने में बिलीव नहीं करता ना ही किसी को ऐसी राय देता हु... लेकिन दादा ऐसे थे के उनसे दिल लग ही जाता है।
'दादा' ये शब्द सिर्फ अजित दादा के लिए ही बना है।
दादा से कभी किसीको डर नही लगता था।
दादा जब सिविल हॉस्पिटल में cardiac cathlab का inaguration करने आने वाले थे तो हम लोग डर से नहीं एक्साइटमेंट से काम कर रहे थे के दादा का कुछ बोलते नहीं आता पता नही क्या चेक करेंगे।
वही हुआ दादा ने आते ही पहले दरवाजे के नट चेक किए और उसपर से झापा।
मेरे घर पहुंचते पहुंचते video youtube पर आगया और मुझे घर
वाले ने बोला अच्छा हुआ तुम लोगो को दादा ने झांपा! मैने कहा मै दादा को कहूंगा दादा तुम तो अब घर में झगड़ा लगाओगे। काम करने का pressure ऊपर से नही घर से! यही दादा के काम करने का स्टाइल था!
लेकिन दादा के झापने से किसी को बुरा नही लगा किसी का दिल नही दुखा।
दादा ने कभी किसी का करियर नही खत्म किया कभी किसी की जिंदगी नहीं तबाह की।
काम करने की एक energy मिली के नही नही दादा ने बोला है तो करना पड़ेगा।
पूरे स्टाफ को ऐसा फील होने लगा के हमारे सर पे अब दादा का हाथ है। अब हम को बगैर कोई वजह के तकलीफ नही दे सकता और दादा के लिए अब हमको दुगना काम करना है।
बीड का पालकत्व दादा ने जब लिया तो उसे निभाया भी बीड के लोगो को अपनाया भी। मीडिया के जैसा नही जो हमको इतना इग्नोर करता है के कोई भी हेडलाइन में दादा पालकमंत्री बीड ऐसा उल्लेख भी नहीं किया
ऐसे बीड को दादा ने अपना दिल दिया।
बीड के लोगो ने भी फिर एक बार सपने देखने की हिम्मत की।
लेकिन हमारी किस्मत हमेशा की तरह खराब निकली !
अब हमें इन्तएजार है के कोई आए और कहे के मै दादा के सपने को पूरा करूंगा तो भी हमे यकीन नही होगा।
हमको को ही एक हो कर अब हमारे जिले का विकास करना होगा खयाल रखना होगा।
हमको को ही अब दादा ने लगाए हुए पौधों का ख्याल रखना होगा और अपने जिले को रेगिस्तान बनने से रोकना होगा
क्यों के अब दादा नही है
हमारी लाख ख्वाइश है के दादा फिर से सिविल हॉस्पिटल आए और हमको झांपे !

लेखन - शेख अरशद इस्हाक़ (फार्मासिस्ट)

ज़िला अस्पताल, बीड़।

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