मरहूम मौलाना बाक़ी के लिये बच्ची अफ़ीफ़ा की ज़िद "मुझे भी अल्लाह के पास जाना है"
मरहूम मौलाना बाक़ी के लिये बच्ची अफ़ीफ़ा की ज़िद "मुझे भी अल्लाह के पास जाना है"
*एस.एम.न्युज़ विशेष*
अफ़ीफ़ा की बड़े मौलाना (अब्दुल बाक़ी अलैहिर्रहमा) से मासूमाना मुलाक़ात
(मुझे भी अल्लाह के पास जाना है)
जुमे की सुबह जब ग्यारह बजे सूरज की नरम किरनें ज़मीन को छू रही थीं और हवा में एक अजीब सी ख़ामोशी थी, मेरी अहलिया अपने दो माह के नन्हे अबू दुजाना को गोद में लिए हुई थी, हमशिरा और मेरी पौने चार साल की मासूम लाडली बेटी अफीफा — हम सब हज़रत मौलाना अब्दुल बाक़ी साहब हुसामी रहमतुल्लाहि अलैह के घर उनकी अहलिया मुहतरमा से तअज़ियती मुलाक़ात के लिए रवाना हुए।
अफ़ीफ़ा जो अपनी नन्ही सी दुनिया में मगन रहती है, चंद रोज़ से मौलाना की वफ़ात से मुताल्लिक वीडियोज़ और तस्वीरें देख रही थी। उसके नन्हे दिल व दिमाग़ में मौलाना की शख्सियत एक अज़ीम हस्ती की मानिंद समाई हुई थी। हमने उसके मासूमाना सवालों के जवाब में समझाया था कि मौलाना बीमार हुए और अल्लाह के पास चले गए। मगर बच्चों का दिल कहाँ मानता है? उसका नन्हा सा दिल मौलाना से मिलने की ख़्वाहिश से बे-क़रार था जैसे कोई परवाना शमा की तरफ़ लपकता है।
जब हम मौलाना के घर पहुँचे तो मैं बाहर मुफ़्ती महफ़ूज़ साहब के साथ एक कमरे में ठहरा जो मरकज़ी घर से कुछ फ़ासले पर था। उधर घर के अंदर अफ़ीफ़ा ने अपनी माँ और फूफी से मासूमाना ज़िद शुरू कर दी। वो आहिस्ता-आहिस्ता अपनी शर्मीली अन्दाज़ और आवाज़ में कानों में सरगोशी करती हुई पूछने लगी "बड़े मौलाना कहाँ हैं ? मुझे उनसे मिलना है!"
उसकी ज़िद बढ़ती गई तो उसे बताया गया कि मौलाना अब इस दुनिया में नहीं रहे, वो अल्लाह के पास चले गए हैं। मगर उसका नन्हा दिल ये बात समझने से क़ासिर था। आख़िरकार उसे तसल्ली देने के लिए कहा गया "बेटा बड़े मौलाना बाहर बरामदे में हैं, हम वापसी पर उनसे मिलेंगे।"
ये सुनकर वो ख़ामोश तो हो गई लेकिन उसकी मासूम आँखों में एक चमक थी — एक उम्मीद की किरन जो अपने "बड़े मौलाना" से मिलने की तमन्ना से जगमगा रही थी।
वापसी का वक़्त आया तो बाहर बरामदे में भी कोई मौलाना न थे और बिना मुलाक़ात के ही बाहर की तरफ़ रवाँ हुए तो अफ़ीफ़ा फिर बेचैन हो उठी। उसकी आवाज़ में एक मासूमाना इसरार था "बड़े मौलाना कहाँ हैं? मुझे उनसे मिलना है!"
जब तसल्ली-बख़्श जवाब न मिला तो उसकी नन्ही आँखें नम हो गईं और चेहरे पर एक रोता-सा मुंह बन गया। मेरी बीवी और बहन ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की और कहा कि मौलाना अल्लाह के पास चले गए हैं, अब वो वापस नहीं आएँगे। मगर अफ़ीफ़ा ने जवाब में ऐसा जुमला कहा जिसने दोनों के दिल पर सन्नाटा-सा छा दिया। उसने कहा, "मुझे भी अल्लाह के पास जाना है!"
उस एक जुमले में उसकी मासूमियत, उसका दर्द और उसकी ज़िद — सब कुछ समाया हुआ था। वो अपने "बड़े मौलाना" से मिलने के लिए अल्लाह के पास तक जाने को तैयार थी। उसकी मासूमाना बात ने गोया फ़िज़ा को ठहरा दिया।
जब मैं स्कूटर लेकर क़रीब पहुँचा और अफ़ीफ़ा के रोने की वजह पूछी तो मेरी बीवी और बहन ने सारा माजरा सुनाया। मेरा दिल भी बैठ-सा गया। मैंने अफ़ीफ़ा को समझाने की कोशिश की लेकिन उसका नन्हा दिल कहाँ मानने वाला था? आख़िरकार एक तरकीब सूझी। मैंने उसे स्कूटर पर बिठाया और मौलाना के बड़े भाई जनाब अतीक़ साहब के पास ले गया जो अपनी मख़सूस कुर्सी पर बिराजमान तिलावते कुरआन फ़रमा रहे थे।
अतीक़ साहब की शबाहत मौलाना से बहुत मिलती थी — उनका अन्दाज़, उनकी शख्सियत, बहुत कुछ मौलाना की याद दिलाता था। मैंने अतीक़ साहब को सारी सूरते हाल बताई और वो फ़ौरन समझ गए कि अब उन्हें अफ़ीफ़ा के लिए "बड़े मौलाना" बनना है।
मैंने अफ़ीफ़ा से कहा "ये हैं बड़े मौलाना!"
अतीक़ साहब ने बड़ी शफ़क़त से हाथ मिलाया, उसके सर पर हाथ फेरा, उसे प्यार किया और उसकी तसल्ली के लिए कहा "बेटा, मैं ही बड़े मौलाना हूँ।"
अफ़ीफ़ा जो अज्नबियत की वजह से शर्म व हया में डूबी हुई थी, ख़ामोशी से मुस्कराई। उसकी आँखों में इत्मिनान की एक चमक झलक उठी। उसकी ज़िद ख़त्म हुई और उसके चेहरे पर उदासी की जगह हल्की सी मुस्कान फैल गई। लेकिन मेरा दिल... उस लम्हे में कहीं दूर जा निकला था।
मेरी ख़्वाहिश थी कि मैं अपनी अफ़ीफ़ा को मौलाना के सामने ले जाता, उनके हाथों से उसके सर पर दुआओं का साया मांगता, उनकी ज़ियारत कराता। मगर ये ख़्वाहिश अब एक अधूरा ख़्वाब बनकर रह गई। मौलाना तो अपने रब के हुज़ूर जा पहुँचे और हम रह गए — उनकी यादें समेटते हुए, दिल में एक टीस लिए।
अफ़ीफ़ा की मासूमाना ज़िद, उसकी पुरनम आँखें और उसका वो जुमला "मुझे भी अल्लाह के पास जाना है" दिल को चीर गया। उसकी मासूमियत ने हर आँख को नम कर दिया और उसके चेहरे पर आख़िर में छाई मुस्कान ने एक अजीब-सा तबस्सुम बिखेर दिया। मगर ये तबस्सुम भी उस ग़म को न छुपा सका जो मौलाना की जुदाई ने हम सब के दिलों पर छोड़ा।
मौलाना! आपकी जुदाई का ये ज़ख़्म शायद कभी न भरे। अफ़ीफ़ा की तरह हम सब आपसे मिलने को तरस रहे हैं, लेकिन अब ये मुलाक़ात इस दुनिया में कहाँ मुमकिन है? बस दुआ है कि अल्लाह तआला आपको जन्नत-उल-फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए और हमारे नन्हे दिलों की दुआओं को भी क़बूल फ़रमाए।
आमीन।
लेखन - अबू उबैद शकील अहमद मज़ाहिरी
===========================
*एस.एम.न्युज़ च्या सेवा*
१) *कार्यालयीन निवेदन व बातमी* योग्य दरात लिहून मिळेल.
२) विविध वृत्तपत्रात देण्यासाठी *जाहिरात, जाहीर प्रगटन, नावात बदल* च्या जाहिराती स्वीकारल्या जातील.
३) एस.एम.न्युज़ वेबपोर्टल आणि युट्युब चॅनेलसाठी *जाहिराती* स्वीकारल्या जातील.
४) *लेखकांनी* लिहिलेल्या *पुस्तकांचे* प्रकाशन पूर्व *करेक्शन* करून दिले जाईल.
*एस.एम.युसूफ़* (मुक्तपत्रकार)
आसेफ़नगर, बीड.
संपर्क - *9021 02 3121*
*लिखाण काम स्विकारण्याचे वेळापत्रक*
दर शुक्रवारी - सकाळी १०:०० ते रात्री १०:०० पर्यंत
शनिवार ते गुरुवार - सकाळी ०८:०० ते १०:०० व रात्री १०:०० ते ११:०० पर्यंत
*कृपया बदललेल्या वेळापत्रकाची नोंद घ्यावी*


कोणत्याही टिप्पण्या नाहीत
टिप्पणी पोस्ट करा