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कुत्ते-बिल्ली और इंसान के बच्चे!


कुत्ते-बिल्ली और इंसान के बच्चे!

(11 मार्च को इस आर्टिकल की पहली सालगिरह हुई)

प्रिय पाठको, आज मैं कोई समाचार आपके सामने पेश नहीं कर रहा हूंँ बल्कि फिलहाल माहे रमज़ान का महिना चल रहा हैं। इसलिए साफ-सफाई और पाकीज़गी का ख्याल आया। साथ ही छोटे-छोटे बच्चों की पाकीज़गी का भी ख्याल आया। तब सहज ही इस बात की तरफ ध्यान गया कि, आजकल इंसान पाले हुए कुत्ते और बिल्लियों के साफ़सफ़ाई का ख्याल रखते हुए उन्हें पेशाब करने, संडास करने के लिए सिखाता है। इसलिए कुत्ते-बिल्ली यह जानवर होते हुए भी कहांँ हगना है? कहांँ मुतना है? कब हगना है? कब मुतना है? यह न सिर्फ सीख रहे हैं बल्कि उसपर अमल भी कर रहे हैं। जिससे उन्हें पेशाब या संडास आने पर उन्हें पालनेवालेने बताई हुई जगह पर जाकर वह गलाज़त करते हैं। किसी और जगह नहीं करते। यानी इंसान अगर चाहे तो जानवरों को भी अच्छे रखरखाव की ट्रेनिंग देकर उन्हें उस तरह ढ़ाल सकता है, जिस तरह उसकी मर्जी हो।
लेकिन यह क्या - एक तरफ कुत्ते-बिल्लियों को हगने-मुतने की ट्रेनिंग देकर उन्हें उसपर अमल करना सिखानेवाला इंसान खुद ने पैदा किए हुए बच्चों को उनके हगने-मुतने का सीखाने की बजाय उन्हें डायपर पहना रहा है। न सिर्फ़ पहना रहा है बल्कि एक बार डायपर पहना देने के बाद उसमें बच्चे-बच्चियाँ कभी भी हगे, कभी भी मुते इससे उन बच्चों के मांँ-बाप को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। डायपर में हगने-मुतने के बाद जब वह बच्चों के जिस्म पर ज्यादा देर तक रहती है, तब बच्चों के गलाज़त निकलने की जगह खराब होती है। ज्यादा खराब होने पर डॉक्टर के पास जाकर बच्चों का इलाज भी कराना पड़ता है। इसके बावजूद भी इंसान यह समझने को तैयार नहीं कि वह एक तरफ कुत्ते-बिल्लियों को हगने-मुतने की ट्रेनिंग दे रहा है और दूसरी तरफ खुद ने पैदा की हुई औलाद कि गलाज़त से बचने के लिए उन्हें डायपर पहना रहा है। बड़े अफसोस की बात है। कहांँ जा रहा है इंसान? क्या कर रहा है इंसान? क्यों कर रहा है इंसान ऐसा? क्या इंसान को अपने बच्चे-बच्चियों से ज्यादा कुत्ते-बिल्ली प्रिय हो गए हैं? जिनके साफ़-सफ़ाई का ख्याल वह अपने बच्चों से ज्यादा रख रहा है? यह बात कुछ समझ नहीं आ रही है। देखिए यह मज़मून पढ़ने के बाद शायद कुछ लोगों की समझ में आ जाए।==============================

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