ऐ इंसान तेरे मुहल्लों की रौनक बदल गई
दिल बदल गये, बस्तियांँ बदल गई
ऐ इंसान तेरे मुहल्लों की रौनक बदल गई
कभी एक ही मुहल्लो में रहा करते थे सब हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई की तरह
यहांँ अब देखते हैं सब एक दूसरे को अजनबियों की तरह
अब भी याद आते हैं वह दिन
जब राम काका, जीवन काका, महादेव काका के घर बेझिझक आया-जाया करते थे हम
पर अफ़सोस अब नहीं रहे ऐसे हम कदम
बाज़ू की गली में रहा करते थे भिक्कम लाल, छोटूलाल काका
जो हर सुख दु:ख में बनते थे हमारे सच्चे काका
हमारी मकान के बाजू में ही था जैनों का महावीर मंदिर, जहांँ जी भरके खेला करते थे हम
पर आज इस मंदिर की सीढ़ियों पर कदम रखते हुए भी ड़रते हैं हम
हिंदू हो या मुस्लिम जब भी होती थी किसी के घर ब्याह सगाई,
सब इकट्ठा हुआ करते थे भाई
कोई गुज़र जाए कहीं, या हो कहीं निधन
सभी जाया करते थे एक दूसरे के कब्रिस्तान और स्मशान
कभी सभी जाति धर्म के लोगों की मिली-जुली हुआ करती थी बस्तियांँ
आज सभी ने बना ली है अपनी-अपनी अलग बस्तियांँ
सभी के दिल बदल गए, बस्तियांँ बदल गई
इसीलिए ऐ इंसान तेरे मुहल्लों की रौनक बदल गई।
लेखन - एस.एम.युसूफ़
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